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History Of Maharana Pratap In Hindi – महाराणा प्रताप का इतिहास

History Of Maharana Pratap In Hindi - महाराणा प्रताप का इतिहास

History of Maharana Pratap In Hindi. प्रिय छात्रों, आज के इस Lecture में बात करेंगे History of Maharana Pratap In Hindi के बारे में यानि की महाराणा प्रताप के इतिहास के बारे मैं Maharana Pratap कौन थे, उनका जन्म कब और कहां हुआ, महाराणा प्रताप का युद्ध किसके साथ हुआ, महाराणा प्रताप की मृत्यु और कब कैसे हुई.

महाराणा प्रताप की इस पोस्ट में हम जानेंगे की महाराणा प्रताप का इतिहास क्या है, महाराणा प्रताप से रिलेटेड  ये सारे Topic हम History of Maharana Pratap के Lecture में कवर करेगे. तो चलिये दोस्तों, जानते है की ये Maharana Pratap कौन थे और महाराणा प्रताप का इतिहास क्या है.

History of Maharana Paratap In Hindi – महाराणा प्रताप का इतिहास

  • History of Maharana Pratap In Hindi – महाराणा प्रताप का इतिहास क्या है
  • Who Was Maharana Pratap In Hindi ? – महाराणा प्रताप कौन थे?
  • Early Life of Maharana Pratap In Hindi  – महाराणा प्रताप का प्रारम्भिक जीवन
  • महाराणा प्रताप का युद्ध कब और किसके साथ हुआ था?

Who Was Maharana Pratap In Hindi – महाराणा प्रताप कौन थे?

महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया उदयपुर, मेवाड में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे। उनकी वीरता और दृढ़ संकल्प के कारण उनका नाम  इतिहास के पन्नों में अमर है। उन्होंने कई वर्षों तक मुग़ल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया और उन्हें कई बार युद्ध मे भी हराया। वे बचपन से ही शूरवीरा, निडर, स्वाभिमानी और स्वतंत्रता प्रिय थे।

प्रताप जी ने मुगलों की गुलामी कभी मंजूर नहीं की और कई वर्षो तक मुग़लों युद्ध किया और  महाराणा प्रताप ने मुगलों को कईं बार युद्ध में भी हराया। यह देखते हुए अकबर नें कुल 4 बार अपने शांति दूतों को महाराणा प्रताप के पास भेजा। राजा अकबर के शांति दूतों के नाम थे जलाल खान कोरची, मानसिंह, भगवान दास और टोडरमल।

महाराणा  प्रताप का नाम सुनते ही मुग़लों के राजा अकबर को डर लगने लगता था. क्योंकि महाराणा प्रताप  ने अकबर को छाती का ढूढ़ पिला दिया था.

Early Life of Maharana Pratap In Hindi – महाराणा प्रताप का प्रारम्भिक जीवन

Maharna Pratap  का जन्म दिन आज के कैलेंडर के अनुसार 9 मई 1540 में उत्तर दक्षिण भारत के मेवाड़ में हुआ था. आज भी इस दिन राजस्थान में प्रताप का जन्मदिन मनाया जाता हैं. महाराणा प्रताप की पहली रानी का नाम अजबदे पुनवार था. अमर सिंह और भगवान दास इनके दो पुत्र थे. अमर सिंह ने बाद में राजगद्दी संभाली थी.

महाराणा प्रताप के जन्मस्थान के प्रश्न पर दो धारणाएँ है। पहली महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ था क्योंकि महाराणा उदयसिंह एवम जयवंताबाई का विवाह कुंभलगढ़ महल में हुआ। दूसरी धारणा यह है कि उनका जन्म पाली के राजमहलों में हुआ।

महाराणा प्रताप की माता का नाम जयवंता बाई था, जो पाली के सोनगरा अखैराज की बेटी थी। महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था। लेखक विजय नाहर की पुस्तक हिन्दुवा सूर्य महाराणा प्रताप के अनुसार जब प्रताप का जन्म हुआ था.

महारानी जयवंता के अलावा राणा उदय सिंह की और भी पत्नियाँ थी. रानी धीर बाई की चाहती थी, कि उनका पुत्र जगमाल राणा उदय सिंह का उत्तराधिकारी बने. इसके अलावा राणा उदय सिंह के दो पुत्र शक्ति सिंह और सागर सिंह भी थे. इनमे भी राणा उदय सिंह के बाद राजगद्दी सँभालने की मंशा थी, लेकिन प्रजा और राणा जी दोनों ही प्रताप को ही उत्तराधिकारी के तौर पर मानते थे. इसी कारण यह तीनो भाई प्रताप से घृणा करते थे.

महाराणा प्रताप से गिर्दा के कारण वह दोनों जाकर मुघल से जाकर मिल गए और जब महाराणा प्रताप को इस बात का पता चला तोह वह बहुत ही क्रोधित हुए. अकबर ने इसी बात का फायदा उठाते हुए अकबर ने महाराणा को अपने हार स्वीकारने को कहा लेकिन महाराणा प्रताप ने अपनी हार स्वीकार नहीं और वह अकबर से अंतिम सनस तक युद्ध लड़े.

Life Of Maharana Paratap In Hindi और महाराणा प्रताप का जीवन

दोस्तों, History of Maharana Pratap In Hindi मैं सबसे रोचक बात प्रताप जी के शादियां है. महाराणा प्रताप ने अपने जीवन में कुल 11 शादियाँ की थी उनकी पत्नियों और उनसे प्राप्त उनके पुत्रों पुत्रियों के नाम है –

  • महारानी अजबदे पंवार:- अमरसिंह और भगवानदास
  • अमरबाई राठौर:- नत्था
  • शहमति बाई हाडा:- पुरा
  • अलमदेबाई चौहान:- जसवंत सिंह
  • रत्नावती बाई परमार:- माल,गज,क्लिंगु
  • लखाबाई:- रायभाना
  • जसोबाई चौहान:- कल्याणदास
  • चंपाबाई जंथी:- कल्ला, सनवालदास और दुर्जन सिंह
  • सोलनखिनीपुर बाई:- साशा और गोपाल
  • फूलबाई राठौर:- चंदा और शिखा
  • खीचर आशाबाई:- हत्थी और राम सिंह

हल्दीघाटी का युद्ध और महाराणा प्रताप का इतिहास

यह युद्ध 18 जून 1576 ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। भील सेना के सरदार राणा पूंजा भील थे । इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे – हकीम खाँ सूरी।

यह इतिहास का सबसे बड़ा युद्ध था, इसमें मुगलों और राजपूतों के बीच घमासान हुआ था, जिसमे कई राजपूतों ने प्रताप का साथ छोड़ दिया था और अकबर की आधीनता स्वीकार की थी.

1576 में राजा मान सिंह ने अकबर की तरफ से 5000 सैनिकों का नेतृत्व किया और हल्दीघाटी पर पहले से 3000 सैनिको को तैनात कर युद्ध का बिगुल बजाया. दूसरी तरफ अफ़गानी राजाओं ने प्रताप का साथ -निभाया, इनमे हाकिम खान सुर ने प्रताप का आखरी सांस तक साथ दिया.

हल्दीघाटी का यह युद्ध कई दिनों तक चला. मेवाड़ की प्रजा को किले के अंदर पनाह दी गई. प्रजा एवम राजकीय लोग एक साथ मिलकर रहने लगे. लंबे युद्ध के कारण अन्न जल तक की कमी होने लगी. महिलाओं ने बच्चो और सैनिको के लिए स्वयम का भोजन कम कर दिया.

सभी ने एकता के साथ प्रताप का इस युद्ध में साथ दिया. उनके हौसलों को देख अकबर भी इस राजपूत के हौसलों की प्रसंशा करने से खुद को रोक नहीं पाया. लेकिन अन्न के आभाव में प्रताप यह युद्ध हार गये. युद्ध के आखरी दिन जोहर प्रथा को अपना कर सभी राजपूत महिलाओं ने अपने आपको अग्नि को समर्पित कर दिया. और अन्य ने सेना के साथ लड़कर वीरगति को प्राप्त किया.

इस सबसे वरिष्ठ अधिकारीयों ने राणा उदय सिंह, महारानी धीर बाई जी और जगमाल के साथ प्रताप के पुत्र को पहले ही चित्तोड़ से दूर भेज दिया था. युद्ध के एक दिन पूर्व उन्होंने प्रताप और अजब्दे को नीन्द की दवा देकर किले से गुप्त रूप से बाहर कर दिया था.

इसके पीछे उनका सोचना था कि राजपुताना को वापस खड़ा करने के लिए भावी संरक्षण के लिए प्रताप का जिन्दा रहना जरुरी हैं.मुगुलो ने जब किले पर हक़ जमाया तो उन्हें प्रताप कहीं नहीं मिला और अकबर का प्रताप को पकड़ने का सपना पूरा नही हो पाया.

युद्ध के बाद कई दिनों तक जंगल में जीवन जीने के बाद मेहनत के साथ प्रताप ने नया नगर बसाया जिसे चावंड नाम दिया गया. अकबर ने बहुत प्रयास किया लेकिन वो प्रताप को अपने अधीन ना कर सका.

इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए। अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितनी देर तक टिक पाते, पर एसा कुछ नहीं हुआ, ये युद्ध पूरे एक दिन चला ओेर राजपूतों ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी। आप इस युद्ध की अधिक गहराई में जानकारी हल्दीघाटी का युद्ध लेख पर पढ़ सकते हैं।

इतिहास से सम्बंधित Lecture

Dear Students, मैं आशा करती हूँ की आपको History of Maharana Pratap In Hindi का Lecture पढ़ कर समझ में आ गया होगा की Maharana Pratap कौन  है. यदि आपको History of Maharana Pratap In Hindi के Lecture से Related कोई भी Problem है तो आप हमे Comment करके पूछ सकते है.

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