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Biography Of Komaram Bheem In Hindi – कोमराम भीम की जीवनी

Biography Of Komaram Bheem In Hindi - कोमराम भीम की जीवनी

Biography Of Komaram Bheem In Hindi – कोमराम भीम की जीवनी। मेरे प्रिय दोस्तों, आज की इस पोस्ट में हम बात करेंगे Biography Of Komaram Bheem In Hindi यानि कि कोमराम भीम की जीवनी के बारे मैं। और पढ़ेंगे कोमराम भीम  कौन थे। उन्होंने देश के लिए कितने महान कार्य किये। कोमराम भीम का जन्म कब और कहाँ हुआ था। कोमराम भीम ने किस तरह भारत देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी और अपने प्राण देश के लिए न्योछावर कर दिए।

कोमराम भीम के जीवन परिचय यानि कि Biography Of Komaram Bheem In Hindi. में हम उनके व्यक्तित्व और द्वारा देश की आजादी के लिए दिए गए योगदान के बारे मैं भी पड़ेगे। किस तरह से कोमराम भीम ने निजाम किए सेना का डटकर सामना किया था। कोमराम भीम ने देश की सेवा के लिए अपना पूरा जीवन जंगलो और वनो में निकाल दिया।

Biography Of Komaram Bheem In Hindi – कोमराम भीम का जीवन परिचय

कोमराम भीम का पूरा जीवन परिचय हम इन बिंदुओं में पढ़ेंगे.

  • कोमराम भीम कौन थे – Who Was Komaram Bheem?
  • कोमराम भीम का जीवन परिचय – Biography Of Komaram Bheem In Hindi
  • कोमराम भीम का इतिहास – History of Komaram Bheem
  • कोमरम भीम – आदिवासी नायक की कहानी
  • कोमराम भीम जिले का इतिहास
  • कोमराम भीम का प्रारम्भिक जीवन
  • गोरिल्ला सेना का गठन
  • विद्रोह का बढ़ना और कोमरम भीम का बलिदान देना
  • पृष्भूमि
  • कोमराम भीम के बारे मैं इतिहासकारों का कहना
  • कोमराम भीम के जीवन की मुख्य फोटो
  • कोमराम भीम का जन्म कब और कहाँ हुआ

“जल जंगल जमीन” एक ऐसा स्लोगन जिसे बोलकर जंगलो मैं रह रहे कोमराम भीम और उनके साथी निजाम और अंग्रेजो से लड़ते थे। इस स्लोगन ने देश के नए युवावर्ग के लोगो को अपने जंगल और जमीन के साथ साथ अपने देश को बचने के लिए प्रेरित करता था। आज हम उन्ही कोमराम भीम के बारे मैं पढ़ने वाले है।

Biography Of Komaram Bheem In Hindi – कोमराम भीम का संछिप्त जीवन परिचय

क्रम संख्या जीवन परिचय बिंदु जीवन परिचय
1 नाम कोमराम भीम
2 जन्म जन्म 22 अक्टूबर 1901(तेलंगाना)
3 नागरिकता भारीतय,
4 राष्ट्रीयता,  धर्म भारतीय , हिन्दू
5 पहचान जल जंगल जमीन का नारा
6 पत्नी सोम बाई
7 मृत्‍यु 1 सितम्बर, 1940

कोमराम भीम कौन थे – Who Was Komaram Bheem

कोमराम भीम एक ऐसा नाम एक ऐसी पहचान ऐसा व्यक्ति जो महान होने के बाद भी गुमनाम हो गए इसमें दोष सिर्फ हमारे एजुकेशन सिस्टम का है जिसमे हमें मुगलों और अंग्रेजो के इतिहास के बारे में ही पढ़ाया गया। हमें कभी भी अपने देश के महान लोगो के बारे में पढ़ाया ही नहीं जाता है।

जिस तरह हमें जीवन जीने के लिए रोटी कपडा और मकान की जरूरत है ठीख उसी तरह हमारे लिए अपने  देश के नायक हो या खलनायक हो या कोई गद्दार ही क्यों न हो हमें जानना बहुत जरूरी है। हमारे लिए हमारे अतीत को जानना ज्यादा जरुरी है। कोमराम भीम तेलंगाना के आदिवासी नेता थे जिन्होंने जल, जंगल और जमीन का नारा दिया था।

बिरसा मुंडा, सिद्दू कान्हू जैसे अन्य आदिवासी नायको की तरह कोमराम भीम का नाम भी प्रचलित होना चाहिए था। उन्होंने भी देश के जंगलो और देश की सेवा की है। देश को दुश्मनो से बचाने के लिए परन्तु वो सिर्फ एक स्थानीय नायक बन कर रह गए। यह हमारे एजुकेशन सिस्टम की कमी के कारण हो रहा है।

Biography Of Komaram Bheem In Hindi – कोमराम भीम का जीवन परिचय

कोमाराम भीम का जन्म 22 अक्टूबर 1901 को तेलंगाना के आदिलाबाद जिले के संकेपल्ली गांव में गोंड (कोइतुर) जाति के परिवार में हुआ था। कोमराम भीम भारत के एक जनजातीय नेता थे जिन्होने हैदराबाद की मुक्ति के लिये के आसफ जाही राजवंश के विरुद्ध संघर्ष किया। उनका संघर्ष छापामार शैली का था। उन्होने निजाम के न्यायालयी आदेशों, कानूनों और उसकी प्रभुसत्ता को सीधे चुनौती दी और वन में रहकर संघर्ष किया।

कोमराम भीम ऐसे क्रांतिकारी थे जो बिलकुल भी पढ़े लिखे नहीं थे ये कभी भी किसी स्कूल में पड़ने नहीं गए। क्योंकि ये एक आदिवासी थे जो की जंगलों में रहते थे और जंगलो में स्कूल नहीं होते थे। उन्होंने अपने समाज के लोगो की समस्याओं को इतनी गौर से देखा और उन्ही सस्याओं से जीवन में बहुत कुछ सीखा।

लेखक मैपति अरुण कुमार ने अपनी किताब ‘आदिवासी जीवना विद्धवंसम’ में लिखा हैं – भीम, जंगलात पुलिस (फ़ॉरेस्ट गार्ड), व्यवसायियों और ज़मीनदारों द्वारा गोंड और कोलाम आदिवासियों पर हो रहे शोषण को देखते हुए बड़े हुए। जीवन यापन के लिए वे एक स्थान से दूसरे स्थान भटकते और इस तरह खुद को व्यापारियों और अधिकारियों के शोषण और जबरन वसूली से भी खुद को बचाते।

उस समय हैदराबाद के फारेस्ट गॉर्ड, जमींदार और निजाम आदिवासियों पर तरह तरह के अत्याचार करते थे और उनके द्वारा की गयी खेती की फसल को अपने खेत और जमीन कहकर उनसे कर के रूप मैं वसूल लिया करते थे। आदिवासियों की पत्नियों और बेटियाँ के साथ दुराचार और बच्चों के हाथों की उंगलिया काट लिया करते थे।

पेड़ों को काटने और जानवरों की तस्करी करने का उन पर झूठा केस लगा दिया करते थे। इन परिस्थितियों में, आदिवासियों के अधिकार के लिए लड़ने के कारण फारेस्ट अधिकारियों ने भीम के पिता की हत्या कर दी। इस तरह के अत्याचार को देखते हुए कोमराम भीम बड़े हुए।

Biography Of Komaram Bheem In Hindi – कोमराम भीम का प्रारम्भिक जीवन

कोमराम का बचपन बहुत ही दुःख में गुजरा उन्होंने सिर्फ आदिवासियों पर होते जुल्म और अत्याचार को देखकर ही अपना पालन पोषण किया। आदिवासियों पर हो रहे अध्यधिक अत्याचार के कारण वह वहाँ से भागने लगे। आदिवासियों के हक़ के लिए लड़ाई लड़ रहे कोमराम के पिता की हत्या कर दी गयी जिसके बाद वह बहुत क्रोधित हुए। और उनका पूरा परिवार संकेपल्ली से सरदारपुर चला गया।

1940 में अक्टूबर के महीने की बात है, एक दिन पटवारी लक्ष्मण राव निज़ाम पट्टादार सिद्दीकी अन्य 10 लोगों के साथ गाँव में आये और लोगों को गालियाँ देने लगे व खेती के बाद जबरन टैक्स वसूली के लिए परेशान करने लगे। लोगों ने इसका विरोध किया और इस संघर्ष में कोमरम भीम के हाथों सिद्दीकी की मौत हो गयी।

इस भयंकर घटना के बाद कोमराम अपने साथी कोंडल के साथ गांव चंद्रपुर की शरण ली। वहां जाकर उनकी मुलकात बिटोवा से हुयी जोकि एक पत्रकार थे और उन दिनों निजाम और अंग्रजी सरकार के खिलाफ पत्रिका छापा करते थे। बिटोवा ने कोमराम की मदद की और बिटोवा ने कोमराम और कोंडल को अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू सिखाई।

बिटोवा को अंग्रेजी सरकार ने गिरफ्तार करने के बाद उनके प्रेस को बंद कर दिया। भीम और उनके साथी भी वहाँ से चले गए। वहाँ से जाकर कोमराम भीम मंचरियल (तेलंगाना) रेलवे स्टेशन में मिले एक युवक के साथ चाय बागान में काम करने के लिए असम चले गए। असम में उन्होंने साढ़े चार वर्षों तक काम किया और कार्यरत होते हुए चाय बागान के मजदूरों के अधिकारों के लिए मालिकों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी किया।

इस बीच भीम को कई बार जेल भी जाना पड़ा। कोमराम की तरह ही अल्लूरी सीतारामराजू भी आदिवासियों के लिए लड़ रहे थे। जिनके बारे में कोमराम ने सुना और उनसे मिलने के लिए आंध्रप्रदेश गए। उनसे मिलकर वह बहुत प्रभावित हुए। और उनके साथ मिलकर काम करने लगे।लौटने के बाद उन्होंने आदिवासियों के भविष्य के संघर्ष की योजना बनानी और लोगों को संगठित करना शुरू कर दिया।

पृष्भूमि – Biography Of Komaram Bheem In Hindi

बल्लारशाह से लौटने के बाद कोमराम भीम अपने परिवार के साथ काकनघाट रहने लगे। देवदम गांव के मुखिया के साथ लच्छू पटेल ने काम किया। कोमराम भीम ने वही रहकर सोम बाई के साथ शादी की जिसमे उनके साथ उनके भाई माता और लच्छू पटेल थे।

कोमरम ने लच्छू के जमीन से संबधित मुकदमे को असिफाबाद के अमीनसाब के सामने रखने में मदद की। इस घटना से कोमरम आस पास के गाँव में लोकप्रिय हो गए। कोमराम भीम अपने परिवार के साथ भाबेझारी चले गए। और बहां उन्होंने खेती करने के लिए जंगल को साफ किया। और वह खेती कर के अपने परिवार को पालने लगे।

कुछ समय बाद वहां पर पटवारी,जंगल विभाग और चौकीदार मिलकर उसकी फसल की कटाई के समय गांव पहुंचे और उन्हें बहुत परेशान करने लगे। उनसे कहा की यह निजाम की जमीं है।और उनसे परिवार सहित वहां से निकल जाने को कहा। निज़ाम के शासनकाल के दौरान असह्य टैक्स लगाये जाते थे और आदिवासी समाज बड़े पैमाने पर जमीनदारों के शोषण और अत्याचार का शिकार था।

कोमराम भीम द्वारा गोरिल्ला सेना का गठन

भीम जी ने गोरिल्ला सेना का गठन किया। जिसमे उन्होंने बारह गावं जोड़ेघाट, पाटनपुर, भाबेझारी, टोकेन्नावडा, चलबरीदी, शिवगुडा, भीमानगुंदी, कल्लेगाँव, अंकुसपुर, नरसापुर, कोषागुडा, लीनेपट्टेर के आदिवासी युवाओं और आम लोगो को इक्कठा किया। जिससे गोरिल्ला सेना का गठन हुआ।

भीम ने निज़ाम सरकार के खिलाफ वृहद् आन्दोलन की शुरुवात की और उनकी सेना के खिलाफ गोरिल्ला वारफेयर (युद्ध) की तकनीक को अपनाया। जोड़ेघाट को अपने संघर्ष का केंद्र बनाते हुए उन्होंने 1928 से 1940 तक गोरिल्ला युद्ध जारी रखा।

उन्होंने इस क्षेत्र को एक स्वतंत्र गोंडवाना राज्य घोषित करने का माँग रखी “तुडुम” आवाज के साथ इस आंदोलन की शुरुआत की गयी थी। बाबेझारी और जोड़ेघाट में हमला करके गोरिल्ला सेना का विद्रोह आरम्भ किया। इस भयंकर विद्रोह के बाद निजाम ने अपनी हार मान ली और असिफाबाद के कलेक्टर को कोमरम भीम से समझौता करने को भेजा।

इस समझौते मैं आदिवासियों को भूमि का पट्टा दिया जाएगा और अतिरिक्त भूमि कोमरम भीम को स्व शासन हेतु दिया जाएगा। कोमराम ने निजाम के प्रस्ताव को ठुकरा दिया और कोमरम ने झूठे आरोप में गिरफ्तार किये गए लोगों को छोड़ने की मांग की।  साथ ही स्व शासन की माँग करते हुए निजाम को गोंड लोगों के स्थान से निकल जाने को कहा।

विद्रोह की शुरुआत होते ही गोंड आदिवासियों ने अत्यंत उत्साह और जूनून के साथ अपने जमीन की रक्षा की. कोमरम के नेतृत्व कौशल ने लोगों को “जल जंगल जमीन” के आन्दोलन से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया और भविष्य को बचाने के लिए लोगों ने आखरी सांस तक लड़ने का निश्चय किया। इसी समय कोमरम भीम ने ‘जल, जंगल और जमीन’ का नारा भी दिया।

विद्रोह का चरम और कोमराम का बलिदान

वो कहते है न की हर काम की एक चरम सीमा होती है और ठीख उसी तरह निजाम के अत्याचारों की भी चरम पूरा हो चुका था। और इधर कोमराम का विद्रोह भी अपने चरम था। निजाम ने कोमराम की सभी मांगो को ठुकरा दिया और उन आदिवासियों पर अत्याचार करता रहा। इसके साथ ही निजाम ने भीम को मारने की योजना बनाने लगा।

तहसीलदार अब्दुल सत्तार ने इस क्रूर षड्यंत्र को अंजाम दिया और कप्तान एलिरजा ब्रांड्स के साथ 300 सैनिकों को लेकर बाघेजारी और जोड़ेघाट की पहाड़ियों में भेज दिया। निजाम के सेना कोमराम को पकड़ने में असफल रही तो उन्होंने कुडु पटेल (गोंड) को  रिश्वत देकर उसे निजाम का मुखबिर बना लिया। जिसने उन्हें कोमरम की सेना के बारे में बताया।

1 सितम्बर, 1940 की सुबह में जोड़ेघाट की महिलाओं ने गाँव के आस पास कुछ सशस्त्र पुलिस कर्मियों को देखा था, जो कोमरम भीम की खोज में थे। भीम, जो अपने कुछ सैनिकों के साथ वहां ठहरे हुए थे, पुलिस के आने की खबर सुनकर सशस्त्र तैयार हो गए हालांकि ज्यादातर सैनिक कुल्हाड़ियाँ, तीर-धनुष, बांस की छड़ी आदि ही जुटा पाए थे।

आसिफाबाद तालुकदार – अब्दुल सत्तार ने एक दूत भेजकर भीम को आत्मसमर्पण कराने का प्रयास किया। कोमराम ने आत्मसमर्पण की जगह लड़ने का निर्णय लिया। सत्तार ने सीधा गोली चलने के आदेश दिया। कोमरम और उनके सैनिक बन्दूक के आगे असहाय थे और ज्यादा कुछ न कर सके। इस घटना में कोमरम के अलावा 15 और सैनिक शहीद हुए।

इस पूरी घटना के बाद आदिवासियों में मातम झा गया सभी लोग बहुत उदास थे और शहीदों के मृत शरीर को बिना अंतिम संस्कार किये ही जला दिया गया। इसके बाद उसी रात में कोमरम के सैकड़ों अनुयायियों ने आदिवासियों के पारम्परिक हथियार धनुष, तीर और भाले से पुलिस का बहादुरी से सामना किया और अपने जान की कुर्बानी दी।

‘भीम को परंपरागत जादुई मंत्रो का ज्ञान है’, की धारणा को मानकर उन्हें डर था कहीं भीम फिर से जीवित न हो जाएं। इसलिए उन्होंने भीम के शरीर में तब तक गोलियां दागी जब तक उनका शरीर छिल्ली हो गया और पहचान योग्य न रहा। अशौजा पूर्णिमा के उस दिन एक गोंड सितारा गिर गया और जोड़ेघाट की पहाड़ियां रो उठी। ‘कोमरम भीम अमर रहे, भीम दादा अमर है’ के नारों से सारे जंगल गूँज उठे।

कोमरम भीम, भगत सिंह की मृत्यु के बाद उनके बारे में सुन कर बहुत प्रभावित हुए थे। वो निजाम के हिन्दू विरोधी नीतियों के खिलाफ लड़ने के कारण हिन्दू योद्धा भी कहलाए। असिफाबाद जिले का नाम बदल कर इन्ही के नाम पर कोमरम भीम रख दिया गया है। ऐसे महान आदिवासी नयाक को सत सत बार नमन।

कोमराम भीम के बारे मैं इतिहासकारों का कहना

कोमरम भीम के बारे में मौजूदा ऐतिहासिक लेखों का दावा है कि कोमरम भीम एक “राष्ट्रवादी वनवासी” नेता थे जिन्होंने निज़ाम सरकार के खिलाफ संघर्ष किया। ये दावा करते हैं कि भीम की नाराज़गी ‘हिन्दुओं’ पर हो रहे इस्लामी (निज़ाम) शोषण से थी, जिससे कि हिन्दू संस्कृति का हास हो रहा था।

कोमरम भीम ‘इस्लामी’ शोषण के खिलाफ लड़ रहे एक “हिन्दू” का प्रतीक हैं। भीम ने ‘हिन्दू’ धर्म को स्वीकार किया और हिन्दुओं के अधिकार की लड़ाई की। वास्तव में कोमरम भीम का संघर्ष पूर्ण रूप से आदिवासियों पर हो रहे शोषण और अत्याचार के खिलाफ था, यह संघर्ष जल जंगल जमीन के अधिकार के लिए था।

अपने लोगों की कल्पना में, भीम केवल अपने लोगों को ‘दिकु’ (बाहरी लोगों) से मुक्त कराने, उन्हें न्याय दिलाने और स्वशासन स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहे थे। हर वर्ष अश्वयुजा पूर्णिमा के दिन गोंड समुदाय कोमरम भीम की पुण्यतिथि मनाता है.

इस अवसर पर उनके जीवन और संघर्ष को याद करने के लिए जोड़ेघाट में एक समारोह का आयोजन किया जाता है। लम्बे समय तक संघर्ष के बाद, उनकी मृत्यु के 72 साल बाद, 2012 में भीम की मूर्ती को टैंक बैंड, हैदराबाद में स्थापित किया गया।

कोमराम भीम जिले का इतिहास

कोमाराम भीम जो की तेलंगाना के जिलों में एक जिला है, इसका मुख्यालय असिफाबाद है, जिले में 2 उपमंडल है 15 ब्लॉक है, और 2 विधान सभा क्षेत्र है, और जिला स्वयं आदिलाबाद लोकसभा क्षेत्र है।कोमाराम भीम जिले का क्षेत्रफल 4,300.16 किमी 2 (1,660.30 वर्ग मील) है।

2011 की जनगणना के अनुसार कोमाराम भीम की जनसँख्या लगभग 592,831 है और जनसँख्या घनत्व 140 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है, कोमाराम भीम की साक्षरता 58.80% है, महिला पुरुष अनुपात यहाँ पर 998 है, जिले की जनसँख्या विकासदर 2001 से 2011 के बीच 22.67% रही है।

कोमाराम भीम जिला भारत में कहाँ पर है

कोमाराम भीम भारत के राज्यो में दक्षिण पश्चिम में मध्य भाग में स्थित तेलंगाना राज्य में है, कोमाराम भीम तेलंगाना के उत्तर की तरफ स्थित है और इसकी उत्तर से पूर्व तक की सीमाएं महाराष्ट्र के जिलों से मिलती है, कोमाराम भीम 19°36′ उत्तर 79°27′ पूर्व के बीच स्थित है।

कोमाराम भीम की समुद्रतल से ऊंचाई 505 मीटर है, और कोमाराम भीम तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद जिले से 400 किलोमीटर उत्तर पूर्व की तरफ राष्ट्रिय राजमार्ग ४४ और हैदराबाद से रामगुंडम मार्ग पर है, और भारत की राजधानी दिल्ली से 1315 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम की तरफ राजमार्ग 44 पर है।

कोमराम भीम के जीवन की मुख्य फोटो

कोमराम भीम के जीवन के कुछ मुख्या द्रश्य जो हम आपको नीचे दिखाने वाले है :-

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प्रिय छात्रों, मैं आशा करती हूँ की आपको Biography On Komaram Bheem In Hindi – कोमराम भीम का जीवन परिचय को पढ़कर अच्छा लगा होगा. अब आप भी Biography On Komaram Bheem In Hindi  के बारे में लिख सकते है और लोगो को समझा सकते है. यदि आपको इस Biography On Komaram Bheem In Hindi  से related कोई भी समस्या है तो आप हमें comment करके पूछ सकते है.

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